आज के दौर में लोग अपने अंदर की कमी को दूर करने से ज्यादा दूसरों में कमी ढूंढने की तलाश में रहते हैं। लोगों को सोच ऐसी हो गई है कि उन्हें लगता है कि वह जो कहते हैं, बोलते हैं वह एकदम सही है और दूसरा व्यक्ति जो कह रहा है वह गलत है उसमें सुधार की जरूरत है। हिंदी साहित्य के एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई का व्यंग्य ‘वैष्णव की फिसलन’ उन लोगों पर सटीक बैठती है तो अपनी कमियों को छिपाने के लिए नैतिकता का मुखौटा पहन लेते हैं।
‘वैष्णव की फिसलन’ हिंदी साहित्य में एक ऐसी कालजयी रचना है, जो धार्मिक पाखंड और सामाजिक दिखावे पर करारा प्रहार करती है। इस व्यंग्य में परसाई ने “बचाव पक्ष का बचपन” जैसे प्रतीकों के माध्यम से यह दिखाया कि कैसे लोग अपनी कमियों को छिपाने के लिए नैतिकता का मुखौटा पहन लेते हैं।
आज के समाज में, जहां सोशल मीडिया पर दिखावटी भक्ति, फर्जी नैतिकता और आडंबर का बोलबाला है, परसाई का यह व्यंग्य और भी प्रासंगिक हो जाता है। चाहे वह धर्म के नाम पर ठगी हो या नैतिकता का ढोंग।
वैष्णव की फिसलन आज के दौर में हमें आईना दिखाता है, जहां लोग अपनी फिसलन को छिपाने के लिए मासूमियत का बहाना बनाते हैं। परसाई की तीखी लेखनी आज भी हमें यह सवाल पूछने को मजबूर करती है। क्या हमारा समाज वाकई बदल गया है, या बस पाखंड के नए-नए रूप सामने आ रहे हैं।
About the Author
Product details
- Publisher : Rajkamal Prakashan
- ISBN-10 : 8126702648
- ISBN-13 : 978-8126702640
- Author : Harishankar Parsai
- Language : Hindi
- Pages : 550
- Binding : Paperback



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