‘बाँसलोई में बहत्तर ऋतु’ समकालीन कविता में पर्यावरण को केंद्रीय कथ्य के रूप में प्रतिष्ठित करने वाली एक विशिष्ट कृति है। इस पुस्तक के प्रथम खंड में केदारनाथ सिंह, कुँवर नारायण, मंगलेश डबराल सहित साठ से अधिक समकालीन कवियों की रचनाओं के आलोक में पर्यावरण-संचेतना को सूक्ष्मता से समझने का प्रयास किया गया है। द्वितीय खंड में कवि-लेखक सुशील कुमार की चौंसठ पर्यावरण-निबद्ध कविताएँ चार सर्गों: पहाड़, जंगल, नदी और तराई में संयोजित हैं। ये कविताएँ प्रकृति की पीड़ा, उसके दुर्द्धर्ष संघर्ष और आशा का एक सुदीर्घ आख्यान रचती हैं तथा समकालीन कविता में पर्यावरण और पारिस्थितिक विमर्श का एक नया आयाम खोलती हैं, जहाँ कटते जंगल, सूखती नदियाँ और टूटते पहाड़ की करुण, आत्मीय गाथा मौजूद है। यह हिंदी साहित्य में पर्यावरण विषयक रचना-दृष्टि की एक अनूठी पहल है।
यह पर्यावरण साहित्य के पाठकों, शोधार्थियों और चिंतकों के लिए एक बहुपयोगी और प्रासंगिक कृति है।
About the Author
जन्म : 13 सितम्बर 1964, पटना सिटी (बिहार)
प्रकाशित कृतियाँ :
कविता संग्रह—कितनी रात उन घावों को सहा है (2004), तुम्हारे शब्दों से अलग (2011), जनपद झूठ नहीं बोलता (2012), हाशिये की आवाज (2020), पानी भीतर पनसोखा (2025)। आलोचना—आलोचना का विपक्ष (2019), हिंदी ग़ज़ल का आत्मसंघर्ष (2021)
झारखंड शिक्षा सेवा कैडर में जिला शिक्षा पदाधिकारी के पद से दुमका से सितंबर 2025 में सेवानिवृत्त।
Product details
- Publisher : Hind Yugm
- ISBN-10 : 8119555473
- ISBN-13 : 978-8119555475
- Author : Sushil Kumar
- Language : Hindi
- Pages : 276
- Binding : Paperback



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